शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

नित्यानंद


परिचय -
20 अगस्त 1981 को पश्चिम बंगाल के बारुइपुर, दक्षिण चौबीस परगना के शिखरबाली गांव में जन्मे नित्यानंद गायेन की कवितायेँ और लेख सर्वनाम, कृतिओर, समयांतर, हंस, जनसत्ता, अविराम ,दुनिया इनदिनों, अलाव, जिन्दा लोग, नई धारा , हिंदी मिलाप, स्वतंत्र वार्ता, छपते –छपते, समकालीन तीसरी दुनिया, अक्षर पर्व, हमारा प्रदेश, कृषि जागरण आदि पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित .
इनका काव्य संग्रह ‘अपने हिस्से का प्रेम’ (२०११) में संकल्प प्रकाशन से प्रकशित. कविता केंद्रित पत्रिका ‘संकेत’ का नौवां अंक इनकी कवितायों पर केंद्रित .इनकी कुछ कविताओं का नेपाली, अंग्रेजी, मैथिली तथा फ्रेंच भाषाओँ में अनुवाद भी हुआ है . फ़िलहाल हैदराबाद के एक निजी संस्थान में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन.


जो लोग हिंदी कविता के भविष्य का रोना रोते रहते हैं और उसके भविष्य को ले कर चिंतित रहते हैं उन्हें हमारे युवा कवियों की कवितायें जरूर पढ़नी चाहिए. तमाम निराशाओं के बीच भी एक आशा और उम्मीद इन युवाओं में साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है. नित्यानंद गायेन ऐसे ही एक कवि हैं जो हमारे समाज और प्रजातंत्र की विसंगतियों को जानते हैं और साफगोई से अपनी बातें रखते हैं. वे अपने उन प्रगतिशील कवियों की हकीकत भी जानते हैं जो हर वक्त प्रगतिशीलता का राग तो अलापते रहते हैं लेकिन मठाधीशी के जूनून में बाज नहीं आते अपनी सामंती हरकतों से. ऐसे ही कुछ प्रगतिशील कवि आजकल अपनी कविताओं की चोरी को ले कर बहुत फिक्रमंद हैं. अगर आपने सूरज, चाँद, सितारा, माँ, पिता, रोशनी, अन्धेरा किसी की भी कोई बात की तो फिर आपकी खैर नहीं, क्योकि यह सारे शब्द और इनसे सम्बंधित विचार तो वह कवि पहले ही अपने नाम पेटेंट करा चुका है और जाहिर सी बात है आप को उस विषय पर कविता लिखने का कोई अधिकार नहीं. देश की कोई भी घटना ऐसे प्रगतिशील कवि को अपनी समस्या के सामने तुच्छ लगती है.
बहरहाल हमारा यह युवा कवि आज की राजनीति खासकर चुप्पी की राजनीति को भलीभांति जानता-समझता है. चुप्पी के पीछे के जोड़-तोड़, दांव-पेंच और महत्वाकांक्षाओं को जानता है. और अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते हुए बोल पड़ता है. तो आईये नित्यानंद के बोल को हम उनकी कविताओं के मार्फ़त ही सुनते हैं.  

नित्यानंद गायेन की कवितायें

१.होश में आने से पहले
दर्द,
उत्पीड़न,
गरीबी,
जैसे शब्द नही है उनके शब्दकोश में
ये सब महलों के वासिंदे हैं
फिर भी कभी –कभी
कर लेते हैं बात इन मुद्दों पर
भावावेश में हम भी आ जाते हैं
और हार जाती है
हिम्मत हमारी हर बार 
वे खेलते हैं
हमारी मूर्छित चेतना से
फिर होश में आने से पहले
बदल जाती है उनकी दुनिया
हम रह जाते अवाक..
हमारे कंठ से
नही फुट पाता विद्रोह का एक भी स्वर
ऐसा क्यों ....?


............................................
२.अपने अहं के साथ खड़े रहे हम
उनमे से कोई नही जानता
कहानी हमारे बिछड़ने की
कुछ ने गवाही दी तुम्हारे पक्ष में
कुछ मेरे हमदर्द बने
अपने अहं के साथ
खड़े रहे हम
जैसे नदी के दो किनारे
किसी ने नही की
हमारे मिलन की बात
बस मन ही मन हँसते रहे
हमने भी न लिया फिर विवेक से काम ...
...................................
३.चुप्पी की भी अपनी राजनीति है 

अन्याय
फिर अन्याय
उस पर भी ख़ामोशी

चुप्पी की भी अपनी राजनीति है
समझ रहे हैं हम

जो खामोश रहे इस दौर में
उतर आये अपने बचाव में 

मैं तोड़ रहा हूँ
अपनी ख़ामोशी
अब आपकी बारी है ...


४.प्रजातंत्र की नंगी तस्वीर

तुम्हारे हाथ उठे जब –जब
आम आदमी के बहाने
हमने देखी खुली आँखों से
प्रजातंत्र की नंगी तस्वीर

लूट हुई, दंगे हुए
बटवारा हुआ इंसानियत का
तुमने सिर्फ वोट बटोरे

फिर तुमने कमल खिलाया
कीचड़ का भी अपमान किया
आग लगाई
बस्तियां जलाई
देश में लहू की धार बहाई
दुहाई तुम्हारी दुहाई तुम्हारी


5. उदारवादी लोग
दिल्ली, मुंबई या फिर कोलकाता
यहाँ प्रगतिशील और उदारवादी लोगों की एक बड़ी भीड़ है
ये सभी लेखक या शिक्षक हैं
बहुत सम्मान है इनका, बड़ा नाम है समाज में
इन सबके घरों में कोई न कोई आता है
झाड़ू लगाने, बर्तन मांजने
रात का बचा हुआ खाना
फटे पुराने कपड़े
दान में देते हैं उन्हें
ये सभी उदारवादी लोग
बदले इन गरीब लोगों के बच्चों से
अपनी गाड़ियां धुलवाते हैं
क्रोध में दुत्कारते और गालियाँ भी दे देते हैं अक्सर
यहीं झलकती हैं उन सबकी प्रगतिशीलता ......

6. तुम्हारे फैलाये बाज़ार में

फैल रहा है
शहर का वजूद
गांव सिकुड़ रहे हैं
सीमेंट की चादर के नीचे
दब रही है मिट्टी की खुशबू
इसी शहर में मजदूर बने
मेरे देश के सुदूर ग्रामीण लोग

सड़ रहा है गेंहूँ
पिज़ा का हो रहा है विस्तार
छोड़ो गेंहुयाँ रंग
गोरा होने का क्रीम लगाओ
खान, बच्चन, तेंदुलकर ......
पानी पर नहीं सोचते
पेप्सी -कोला की
दे रहे हैं सलाह
लस्सी, छांछ में क्या रख्खा है ?
गुड़ नही अब कैड्बेरी है
मेहमानों के स्वागत में

असली और सम्पूर्ण पुरुष बनने के लिए
पहले रेमंड पहनिए
बापू ने तो गुजार दी पूरी जिंदगी
घुटनों तक धोती में ...

भूखे रहो
किन्तु फोन खरीदो
सरकार भी बाँट रही है
गरीबों को लैपटाप
भोजन –पानी और सुरक्षा
अब यहीं सर्च करो

तुम्हारे फैलाये बाज़ार में
रोज लूट रहा है
आम जन

सपने देखना अपराध नही
किन्तु सपने दिखा कर लूटना
बहुत संगीन जुर्म है
और जुर्म निरंतर जारी है
मेरे इस गरीब देश में ....

याद आ गये सुकरात
हमने सदियों तक ईश्वर गुलामी की
कभी भय से
कभी लोभ से
फिर भी पिघला नही उनका दिल
बीमारी में , आपदा में
हर पीड़ा में
मिन्नते की
सदियों बाद मालूम हुआ
वे बहरे हैं हमारे लिए
फूल ,माला , फल ,दूध
गहने कपड़े
सब चढाए
उनके मंदिर हो गये आलीशान
हम दीन के दीन ही रहे
मठ और सत्ता पर आसीन
दलालों ने कहा
बने रहो सेवक अच्छे फल के लिए
सड़कों के किनारे पड़े मिले हम
बेहाल -बेघर
बड़ी हिम्मत से ललकारा
आज सदियों बाद
कि स्वीकार नही तुम्हारी दासता
एक स्वर में चीख पड़े सभी पाखंडी
मुझे याद आ गये सुकरात

संपर्क

4-38/2/B, R.P.Dubey Colony,
Serilingampalli, Hyderabad-500019.(A.P.)
Mob-090 308 951 16

मोबाइल
+91-9030895116
+91-9491870715
ई-मेल: nityanand.gayen@gmail.com







सोमवार, 24 दिसंबर 2012

अस्मुरारी नंदन मिश्र

'वाचन-पुनर्वाचन'  के अंतर्गत हमारे  इस बार  के कवि है अस्मुरारी नंदन मिश्र। इनकी कविताओं पर की है हिन्दी और मैथिली के चर्चित युवा कवि अरुणाभ सौरभ। अभी अरुणाभ सौरभ को मैथिली भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया है।  

शिक्षा अव्यवस्थित तरीके से बी.ए. , बी. एड. तक हो पायी..
नौकरी के फेर में ऍम. ए. की पढाई को छोड़कर केंद्रीय विद्यालय का शिक्षक हो लिया
अभी पारादीप पोर्ट (ओडिशा) में कार्यरत हूँ

कवितायेँ लिखता रहा हूँ..
परिकथा, और साखी में प्रकाशित भी हुई हैं किन्तु यह संख्या में अधिक नहीं हैं, संवदिया के आगामी युवा कविता केन्द्रित अंक में भी कविता प्रकाश्य ...
एक पुस्तक समीक्षा भी साखी में प्रकाशित ..


अस्मुरारी की कविताओं से गुजरना एक मौसम, राग, वायुमंडल के मिजाज़ को टोहना है. जहाँ सहजता के साथ जीवनानुभव है जिसमे लय, सुर ताल है, तो खेल भी, गति है तो विराम भी, उम्मीद है तो संघर्ष भी..कम सुखद नहीं है की यह युवा कवि जीवन के हर खानों पर कविता बुनता है, जिसमे व्यायाम है, खेलकूद है, रचनाओं का पुनर्पाठ है, और गिनती के बाहर भी न जाने कितनी विखरी हुई संवेदना है.. व्यवस्थित जीवन की जगह यहाँ अनगढ़पन का सौंदर्य पूरी चेतना में शामिल है. इसीलिए अस्मुरारी उन बहुत कम बचे हुए लोगों को अपनी कविता में शामिल करते हैं, जिनके पास दूब भर हरापन बच गया है. यानी यथार्थ के स्तर पर जीवटता और उम्मीद की आखिरी किरण तक जीवन जीने वाले लोगों के कवि होने की पूरी सम्भावना को अपनी कविता में व्यक्त करते हैं.. इसीलिए प्रेमचंद की पूस की रात कहानी का काव्यात्मक पुनर्पाठ अस्मुरारी करते हैं. इसीलिए शीर्षासन जैसे कठिन व्यायाम को कविताई का स्वरुप और गुणधर्म प्रदान करते हैं. इसीलिए बास्केटबाल जैसा खेल भी कविता का आकार ले लेता है जिसे कवि स्वयं अपरचित होने के बावजूद बच्चों की खुशी और तल्लीनता में रम जाता है. पहाड़ को यार की तरह गले लगाने को उद्धत होना मनुष्य और प्रकृति के बीच सार्थक अंतर्संबंध और पारिस्थितिक अनुकूलनता का विस्तार नहीं तो और क्या है? यह वैज्ञानिक दर्शन की क्लासिकल परिणति है जिसकी फैंटेसी में हर तरह से जीवन के सौंदर्यबोध में डूब जाना सहज आकांक्षा बन जाती है.. भावों की उतप्त गहराइयों में उतरने की यह कोई अतिरिक्त चेष्टा नहीं है, बल्कि जटिल से जटिलतम परिस्थितियों में अपनी पक्षधरता तय कर लेना कवि की प्राथमिकता है.. जहाँ कवितायें भावुकता की रोमानी कल्पनाओं से नही, यथार्थ की सहज चेतना से गढ़ी जाती है. इसीलिए इस यथार्थ में शिल्प का अनगढ़पन मिलना स्वाभाविक भी है और क्रिया प्रसूत भी.  
              कुल मिलाकर अस्मुरारी युवा पीढ़ी की उस सकारात्मक सोच और  गहरी समसामयिक पैठ को अपनी पैनी दृष्टि के साथ कविता में लाते हैं जिनमें गंभीर रचनात्मकता की पूरी समझ है, जीवन-जगत के प्रति जिनमे कुछ नया करने की ललक है. जीवन की ऐसी बहुलार्थता और समकालीन सरोकरों से पूर्णतया अवगत इस कवि की कविता एक अनूठा राग है जिसे स्थितियों द्वारा गाया जा रहा है. विपरीत समय से दो-दो हाथ करने की इस रचनात्मक हिम्मत का स्वागत अवश्य होना चाहिए.
कवितायें जो आपके अंतर्मन को झकझोर दे, एक क्षण के लिए आपको मौन कर दे और आप अचानक संवेदन तंतु के तीव्रतर होने की स्थिति में आ जाएँ ऐसी नायाब संवेदनात्मकता का धनी है हमारा यह युवा कवि, इसी विश्वा पर प्रस्तुत है 'पहली बार' के पाठकों के लिए अस्मुरारी नंदन मिश्र की पांच कवितायें.
अरुणाभ सौरभ

अस्मुरारी नंदन मिश्र की पांच कवितायें
1
शीर्षासन 
---------
कुछ देर शीर्षासन में रह 
उठते ही 
वे लेते हैं गहरी साँसें
फेफड़ों में भर लेना चाहते हैं 
वायुमंडल भर हवा 
घोषित करते हैं इसे शीर्ष व्यायाम
मस्तक थोडा और तन जाता है
मानो उठा रखी थी पूरी पृथ्वी

ब्रहम मुहूर्त के कुछ पल का शीर्षासन 
सर को आसमान में पहुंचा देता है

इधर न जाने कैसी हवा चली है
कि पाँव भी लेने लगे हैं साँसे
और एकाएक कर दिया है घोषित उन्होंने भी 
शीर्षासन को शीर्ष व्यायाम 
चाहते हैं --सर भी ले धरती का पूरा स्पर्श 
धरती को थामने का घमंड नहीं 
सीखें धरती पर टिकने की कला 
तब तक वे भी लहराना चाहते हैं आसमानों में
खेलना चाहते हैं अंतरिक्ष में फूटबाल 

सिरों की दुनिया में खासी बेचैनी है आजकल 
कोसा जा रहा है शीर्षासन के जन्मदाता को
घोषित करवाना चाहते हैं इसे गैर जरुरी ही नहीं
गैर कानूनी भी

लेकिन पैर हैं कि
जूते की नहीं 
पगड़ी की मांग कर चुके हैं...


2
मेरे यार पहाड़
------------
मेरे यार पहाड़
मेरे पूर्वजों ने तुमसे ही पाया था जीवन का संगीत
तुम्हारी गोद में बसाया था छोटा सा गाँव
और बेहद भावुक होकर कहा था--
अरण्यडीह
नीम, बेल बैर.महुआ.......
कितने- कितने पेड़ थे तुम्हारे पास
कई जड़ी-बूटियां
जिसके सहारे वैद्य कहलाते थे 
बाबा

अब दूब भर हरापन नहीं रहा तुम में
मैं सुनता हूँ निर्जीव साँसों का खट-खट
जब भी पत्थर टूटता है.. 

3
बास्केटबाल -खिलाड़ी
----------------------

यूँ नहीं जानता 
बास्केट बाल का क ख ग भी
फिर भी हूँ बास्केटबाल की टीम के साथ

ये जो खेलने आये हैं
अपनी धुन, लय, रंग में दर्शनीय हैं
साथ रहते हुए जाना है
गलती कर बैठते हों भले
गलत नहीं हैं ये
बुरे कामों में फंस कर भी बुरे नहीं
बदमाशियों के बाद भी बदमाश नहीं 
ये अपने खेल में बस खिलाड़ी हैं

अपने भरपूर कौशलों से 
बास्केटबाल पर पकड़ बनाए कितने आकर्षक हैं ये
अपनी चपलता और गत्यात्मक लय से
छल्ले में गेंद को पहुंचाते हुए कितने सुकून देते हैं

खुद-ब-खुद निकलती है असीसें
गेंद की तरह ही रहे पकड़ में इनके भविष्य
छल्ले भर सुरंग से निकलना कभी कठिन न हो 
इनके लिए

आमीन!!

4
पूस की उस एक रात के बाद
----------------------------

सारे ऊख के नष्ट होने के दुःख पर 
रात-रात भर 
ठण्ड सहने की विवशता के खात्मे का संतोष
कहाँ मना पाया हल्कू
पूस की उस एक रात के बाद
पूरे परिवार के साथ 
एक कम्बल में खींचतान करता हुआ रात भर
सोचता रहा
ऊख एक बहाना तो था
ठण्ड सहने का

5
गिनती के बाहर
---------------
उनकी गिनती तीन तक जाती थी 
और मैं  पहले दूसरे  तीसरे में नहीं था

मेरे पहुँचने  के पूर्व ही गिर चुकी थी वह रस्सी
जिसे सीने से धकेल उछल पड़ा था प्रथम
ठीक पीछे दूसरे और तीसरे भी थे
सभी के चहरे पर उल्लास था
सभी खुश थे

मैंने बस पार की अंतिम लकीर
लेकिन इसने भी अर्थ खो दिए थे तब तक
मेरी मांसपेशियां सहलाने वाला कोई नहीं था
किसी ने भी नहीं दी सांत्वना -
कि कुछ और तेज़ दौड़ना था
किसी ने उत्साह नही दिया
कि अभ्यास जारी रखो एक दिन तुम भी फर्स्ट होगे

तालियाँ जरुर कुछ मेरे लिए भी बजी होंगी
लेकिन मुझे नहीं पता
समय के किस बिंदु के बाद वे शिथिल हो गयी होंगी
या कार  लिया हो दल-बदल

हम जो पहले तीन में कहीं नहीं थे
बिलकुल अपनी संवेदना, इच्छा और विश्वास पर 
अकेले खड़े रह गए थे वहां 
बचे रहने की तरह थे हम
और सारी भीड़ जश्न में डूब चुकी थी
क्योंकि रहना ही था किसी न किसी को
प्रथम
द्वितीय 
तृतीय

यूँ हम भी कोई देह चोर नहीं थे
नहीं दिखाई थी थोड़ी भी उदासीनता
हमने भी पूरी ताकत लगा दी थी
झोंक ही दिया था खुद को
लेकिन अब हमारे लिए कुछ नहीं  था वहां

अब हमें आगे जाना  था 
अपनी ही संवेदना इच्छा और विश्वास के सहारे
हमें कोई नहीं जानता था
सारी दुनिया पहले दूसरे और तीसरे के जश्न में साथ थी

सम्पर्क-

अस्मुरारी नंदन मिश्र
केंद्रीय विद्यालय पारादीप पोर्ट
जगत सिंह पुर
ओडिशा
७५४१४२
स्थाई पता-
अस्मुरारी नंदन मिश्र
ग्राम-- अरण्यडीह
जिला-- नवादा
बिहार


मो.नं.-- ९६९२९३४२११
ई - मेल:

बुधवार, 22 अगस्त 2012

उमा शंकर चौधरी







बुजुर्ग पिता के झुके कन्धे हमें दुख देते हैं





मेरे सामने पिता की जो तस्वीर है
उसमें पिता एक कुर्ते में हैं
पिता की यह तस्वीर अध्ूारी है

लेकिन बगैर तस्वीर में आये भी मैं जानता हूं कि

पिता कुर्ते के साथ सफेद धोती में हैं

पिता ने अपने जीवन में कुर्ता-धोती को छोड़कर भी

कुछ पहना हो मुझे याद नहीं है

हां मेरी कल्पना में पिता

कभी-कभी कमीज और पैंट में दिखते हैं

और बहुत अजीब से लगते हैं



मेरी मां जब तक जीवित रहीं

पिता ने अपने कुुर्ते और अपनी धोती पर से

कभी कलफ को हटने नहीं दिया

लेकिन मां की जबसे मृत्यु हुई है

पिता अपने कपड़ों के प्रति उदासीन से हो गए हैं



खैर उस तस्वीर में पिता अपने कुर्तें में हैं

और पिता के कन्धे झूल से गए हैं

उस तस्वीर में पिता की आस्तीन

नीचे की ओर लटक रही हैं

पहली नजर में मुझे लगता है कि पिता के दर्जी ने

उनके कुर्ते का नाप गलत लिया है

परन्तु मैं जानता हूं कि यह मेरे मन का भ्रम है

पिता के कन्धे वास्तव में बांस की करची की तरह

नीचे की तरफ लटक ही गए हैं



पिता बूढेे हो चुके हैं इस सच को मैं जानता हूं

लेकिन मैं स्वीकार नहीं कर पाता हूं

मैं जिन कुछ सचों से घबराता हूं यह उनमें से ही एक है



एक वक्त था जब हम भाई-बहन

एक-एक कर पिता के इन्हीं मजबूत कन्धों पर

मेला घूमा करते थे

मेले से फिरकी खरीदते थे

और पिता के इन्हीं कन्धों पर बैठकर

उसे हवा के झोंकों से चलाने की कोशिश करते थे

तब हम चाहते थे कि पिता तेज चलें ताकि

हमारी फिरकी तेज हवा के झोंकों में ज्यादा जोर से नाच सके



हमारे घर से दो किलोमीटर दूर की हटिया में

जो दुर्गा मेला लगता था उसमें हमने

बंदर के खेल से लेकर मौत का कुंआ तक देखा था

पिता हमारे लिए भीड़ को चीरकर हमें एक ऊंचाई देते थे

ताकि हम यह देख सकें कि कैसे बंदर

अपने मालिक के हुक्म पर रस्सी पर दौड़ने लग जाता था

हमने अपने जीवन में जितनी भी बार बाइस्कोप देखा

पिता अपने कन्धे पर ही हमें ले गए थे



हमारा घर तब बहुत कच्चा था

और घर के ठीक पिछवाड़े मेें कोसी नदी का बांध था

कोसी नदी में जब पानी भरने लगता था

तब सांप हमारे घर में पनाह लेने दौड़ जाते थे

तब हमारे घर में ढिबरी जलती थी

और खाना जलावन पर बनता था

ऐसा अक्सर होता था कि मां रसोई में जाती और

करैत सांप की सांस चलने की आवाज सुनकर

दूर छिटककर भाग जाती

उस दिन तो हद हो गई थी जब

कड़ाही में छौंक लगाने के बाद मां ने

कटी सब्जी के थाल को उस कड़ाही में उलीचने के लिए उठाया

और उस थाल की ही गोलाई में करैत सांप

उभर कर सामने आ गया



हमारे जीवन में ऐसी स्थितियां तब अक्सर आती थीं

और फिर हम हर बार पिता को

चाय की दुकान पर से ढूंढ कर लाते थे

हमारे जीवन में तब पिता ही सबसे ताकतवर थे

और सचमुच पिता तब ढूंढकर उस करैत सांप को मार डालते थे



हमारे आंगन में वह जो अमरूद का पेड़ था

पिता हमारे लिए तब उस अमरूद के पेड़ पर

दनदना कर चढ जाते थे

और फिर एक-एक फुनगी पर लगे अमरूद को

पिता तोड़ लाते थे

हम तब पिता की फुर्ती को देख कर दंग रहते थे

पिता तब हमारे जीवन में एक नायक की तरह थे



मेरे पिता तब मजबूत थे

और हम कभी सोच भी नहीं पाते थे कि

एक दिन ऐसा भी आयेगा कि

पिता इतने कमजोर हो जायेंगे

कि अपने बिस्तर पर से उठने में भी उन्हें

हमारे सहारे की जरूरत पड़ जायेगी



मेरे पिता जब मेरे हाथ और मेरे कन्धे का सहारा लेकर

अपने बिस्तर से उठते हैं तब

मेरे दिल में एक हूक सी उठती है और

मेरी देखी हुई उनकी पूरी जवानी

मेरी आंखों के सामने घूम जाती है



मेरे बुजुर्ग पिता

अब कभी तेज कदमों से चल नहीं पायेंगे

हमें अपने कन्धों पर उठा नहीं पायेंगे

अमरूद के पेड़ पर चढ नहीं पायेंगे

और अमरूद का पेड़ तो क्या

मैं जानता हूं मेेरे पिता अब कभी आराम से

दो सीढी भी चढ नहीं पायेंगे



लेकिन मैं पिता को हर वक्त सहारा देते हुए

यह सोचता हूं कि क्या पिता को अपनी जवानी के वे दिन

याद नहीं आते होंगे

जब वे हमें भरी बस में अंदर सीट दिलाकर

खुद दरवाजे पर लटक कर चले जाते थे

परबत्ता से खगड़िया शहर

क्या अब पिता को अपने दोस्तों के साथ

ताश की चौकड़ी जमाना याद नहीं आता होगा

क्या पिता अब कभी नहीं हंस पायेंगे अपनी उनमुक्त हंसी



मेरे पिता को अब अपनी जवानी की बातंे

याद है या नहीं मुझे पता नहीं

लेकिन मैं सोचता हूं कि

अगर वे याद कर पाते होंगे वे दिन

तो उनके मन में एक अजीब सी बेचैनी जरूर होती होगी

कुछ जरूर होगा जो उनके भीतर झन्न से टूट जाता होगा।



त त त

मां से पिता क्या बहुत दूर थे



- उमा शंकर चौधरी



जब मेरी मां पर हाथ उठाते थे मेरे पिता

तब मेरी मां बहुत ही कातर निगाह से

देखती थी मेरी ओर

मैं तब बहुत छोटा था और यह समझ नहीं पाता था कि

मेरी मां तब मेरी ओर इसलिए देखती थी कि

मैं उन्हें बचा नहीं सकता

या इसलिए कि उन्हें शर्म आती थी

यूं अपने बच्चे के सामने पिता के हाथों पिटते

लेकिन मुझे यह याद अवश्य है

कि मेरी मां की निगाह तब बार-बार मुझ पर आ जाती थी



मेरे पिता बहुत गुस्सैल थे

और अपने गुस्से के क्षणों में

अपने आप को बिल्कुल भी रोक नहीं पाते थे

पिता अपने गुस्से पर काबू क्यांे नहीं कर पाते थे

यह हम भाई-बहन कभी उनसे पूछ नहीं पाये



मैं तब बहुत छोटा था

लेकिन पिता जब भी मेरी मां पर हाथ उठाते थे

तब मुझे बहुत दुख होता था

मुझे बहुत बुरा भी लगता था

और दुख की क्या कहंे मुझे अपने पिता पर बहुत खीझ होती थी



पिता से तब मैं नफरत करता था

और इस नफरत को मैं ही नहीं पिता भी जानते थे



मेरी मां बहुत अच्छी थीं

इसलिए पिता मां पर हाथ क्यों उठाते हैं

यह सोचकर और भी ज्यादा दुख होता था



यह खीझ तब और भी बढ जाती थी

जब मां पिता के सामान्य क्षणों में

पिता का बहुत सम्मान करती थी



मां अपने पड़ोसियों से कहती

कि यह तो इसके पापा ही हैं

जो हमारा घर इतना संभला हुआ दिखता है

मेरा क्या है मैं तो अपने हिस्से की रोशनी कहीं भी रखकर भूल जाती हूं



इसके पिता ने अपनी जिन्दगी में

बहुत दुख देखे हैं

और फिर इस घर को इस तरह संजोया है



मां पिता की जब तारीफ करती थी

तब उनके चेहरे पर कभी भी नहीं दिखता था

पिता का क्रुद्ध चेहरा

और उस क्रुद्ध चेहरे के साथ उनके द्वारा उठाया गया उन पर हाथ





यूं ऐसा नहीं था कि

मेरे पिता मेरी मां को प्यार नहीं करते थे

या फिर ऐसा भी नहीं था कि मेरे पिता की जिन्दगी में

किसी और स्त्री का प्रवेश हो गया था

मेरे पिता ऐसे पुरुषवादी भी नहीं थे कि वे औरत को अपनी जूती समझें

बस पिता अपने गुस्से को रोक नहीं पाते थे



जब पिता काम से थक-हार कर लौटते

तब उनका पारा सातवें आसमान पर होता था

वे तब एक क्षण को भी खाना-पीना या किसी और प्रकार के आदेश में

विलम्ब बर्दाश्त नहीं कर पाते थे

पिता गुस्साते थे और पिता का सारा गुस्सा

मां पर ही निकलता था

पिता मां पर हाथ उठाते थे और मां कातर निगाह से मुझे देखती थी

मैं तब बहुत बच्चा था और मैं बहुत दुखी होता था



पिता जब गुस्से में होते थे तब

उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि

वे अपनी जिन्दगी में सबसे ज्यादा नफरत मेरी मां से करते हैं

मुझे हर बार उनको देखकर ऐसा ही लगता था

कि क्या वाकई पिता मां से छुटकारा चाहते हैं



मेरी मां की मृत्यु कम उम्र में हुई

उनकी मृत्यु जब हुई तब वे पचास को भी छू नहीं पाई थीं

जब मां की मृत्यु हुई तब पिता बहुत रोये थे

और बहुत रोये क्या थे पछाड़ खाकर गिर पड़े थे

और फिर कई दिनों तक होश में नहीं आये थे

तब हमें लगा था कि पिता का व्यक्तित्व भी अजीब है



लेकिन यह व्यक्तित्व तब और भी अजीब लगा था जब

पिता ने मां की मृत्यु के बाद से बोलना बिल्कुल कम कर दिया था

उसके बाद हमने हंसते हुए भी उन्हंे कम ही देखा था

लेकिन सबसे अजीब यह था कि

पिता ने गुस्सा करना बिल्कुल छोड़ दिया था



मां की मृत्यु के इतने बरस बाद

पिता को देखकर यह लगता ही नहीं है कि

ये पिता वही पिता हैं जो कभी गुस्से मंे अपना आपा

इतना खो देते थे कि मां को कातर निगाहों से मुझे देखना पड़ता था

पिता अब एक सौम्य पिता हो गये हैं



जब से मां की मृत्यु हुई पिता ने गुस्साना छोड़ दिया है

पिता बस जीवन को जिये जा रहे हैं

पिता एक बेजान पत्थर से बन गए हैं



मैं इतने बरस बाद

मां और पिता के इस अजीबोगरीब संबंध पर विचार करता हूं

तो बहुत मुश्किल में फंस जाता हूं

कि क्या वाकई पिता मां को बहुत प्यार करते थे

कि पिता कभी समझ ही नहीं पाये कि वे

अपने प्रेम से भी उपर पहले और सबसे पहले एक पुरुष थे

जिसकी उनको खबर भी नहीं थी।





त त त









कामुक बातें करता बुजुर्ग



कामुक बातें करता बुजुर्ग

हमें तकलीफ देता है

कामुक बातें करते बुजुर्ग के पास बैठकर

हमें हमेशा ऐसा लगता है जैसे

हमारे समाज, हमारी संस्कृति को गंदला करने में

सबसे बड़ा हाथ इसी का है।



हम बुजुर्ग के पास बैठते हैं

और बुजुर्ग हमसे स्त्रियों की बातें करने लगता है

सहवास के दौरान की स्त्रियों की विभिन्न मुद्राओं की बातें करना

तो उसका सबसे बड़ा शगल है

और यह भी कि सहवास के दौरान स्त्रियों का कौन सा होता है

सबसे कम्फर्ट जोन।



हम बुजुर्ग के सामने होते हैं और

बुजुर्ग की आंखों में शर्म की कोई महीन रेखा तक नहीं दिखती है

और न ही दिखती है कोई बंदिश

कोई हद

वह अपने को अनुभवी मान स्त्रियों के संग-साथ के

विभिन्न अनुभवों को हमसे साझा करता है

और फिर जोर से ठठा मारकर हंस देता है।



वह प्र्रायः याद करने लग जाता है अपनी जवानी के दिन

कि अपनी प्रेमिकाओं के साथ वह किस तरह

छुप-छुप कर और बहाने बनाकर किया करता था छेड़छाड़

कि बिना एक-दूसरे को खबर हुए

अपने आजू-बाजू में कैसे वह रख लेता था

दो-तीन प्रेमिकाओं को एक साथ

बताने के क्रम में वह यह भी बता जाता है

कि कितनी प्रेमिकाओें के साथ वह चला गया था कितनी दूर

भले ही किया हो उसने प्रेम-विवाह और उसे निभाया हो उसने ता-उम्र

लेकिन वह बुजुर्ग कहता है हमसे

कि स्त्रियां तो प्रेम करने के लिए बनी ही नहीं है

वह कहता है कि एक प्रेमी की सबसे बड़ी जीत यह नहीं है

कि वह अपने जीवन में अपनी प्रेमिका को हासिल कर पाया या नहीं बल्कि यह है

कि वह अपनी प्रेमिका के साथ बहुत दूर तक जा पाया है या नहीं।



वह बुजुर्ग चाहता है कि मैं या कि आप

खुल जाएं उसके साथ

ताकि बेझिझक वह बातें करें हमसे

स्त्रियों के संवेदनशील हिस्सों के बारे में

और यह भी कि स्त्रियांे के कौन से अंग कब हो जाते हैं अधिक संवेदनशील



उस बुजुर्ग के पास बैठते हुए अक्सर हमें दिखती हैं महिलाएं

असुरक्षित

हम सोचने लगते हैं कि कोई स्त्री कैसे खड़ी हो पाती होगी

इस बुजुर्ग के सामने

हम उस बुजुर्ग के सामने स्त्रियों को लेकर

कई कल्पनाएं करने लगते हैं

हमारी कल्पनाओं में वह बुजुर्ग हमें बहुत बुरा लगता है।



कामुक बातेें करते बुजुर्ग की हंसी में एक खुलापन होता है

एक गर्मजोशी

एक संतुष्टि

और जीवन के प्रति एक लोभ



अपनी जिस उम्र में बैठकर

वह बुजुर्ग किया करता है कामुक बातें

और जिसके रस में रहता है वह सराबोर

उसके पास बचे हैं अब बामुश्किल दो-चार-पांच वर्ष



अपनी चेहरे की झुर्रियों के साथ जब वह बुजुर्ग

हो जाता है गंभीर

और छोड़ देता है करनी यह मजेदार बातें

तब हो जाता है वह हताश, निराश और परेशान

तब हो जाता है वह उदास

और तब उसकी आंखों के सामने झिलमिलाने लगते हैं

जिन्दगी की अंतिम बची हुई चंद घड़ियां।



वह बुजुर्ग अपनी शारीरिक जरूरत से नहीं

अपनी मौत की घबराहट से भाग कर लौट आता है फिर से इस दुनिया में

और फिर करने लगता है वह वही रंगीन बातें

जिसे देख और सुन कर हमें होती है तकलीफ

और जिससे इस समाज के लिए हमारे मन में पैदा होती है चिंता



कामुक बातंे करते उस बुजुर्ग के लिए

स्त्री देह ही वह जगह है जहां ठहरकर

वह करता है मौत को अपनी आंखों से ओझल

मौत की दहलीज पर खड़ा वह बुजुर्ग जानता है

मौत का सच

मौत की दहलीज पर खड़े उस बुजुर्ग के लिए

स्त्री की देह ही है मौत को ढंकने वाला वह पर्दा

जिसके सहारे चाहता है वह भागना सच से

कुछ और दिन कुछ और पल।







त त त

गढपुरा स्टेशन पर इंतजार

रात के घुप्प अंधेरे में

गढ़पुरा स्टेशन पर जल रही है ढिबरी

रात के घुप्प अंधेरे में गढ़पुरा स्टेशन पर इंतजार कर रहे हैं हम

रेलगाड़ी के अंतिम खेप की

हम यानि मैं, मेरी बहन और उसका डेढ साल का बच्चा



स्टेशन पर जल रही है ढिबरी

और मुसलाधार बारिश हो रही है

और स्टेशन मास्टर फोन पर ले रहे हैं गाड़ियों की खबर

गाड़ियां जो यहां नहीं रुकतीं

गाड़ियां जो वहां नहीं जातीं जहां जाने को खड़े हैं हम

अभी यहां रुकने वाली सवारी गाड़ी के आने पर

यही स्टेशन मास्टर काटेंगे टिकस

यही स्टेशन मास्टर दिखायेंगे हरी बत्ती

इसी स्टेशन मास्टर के सामने जल रही ढिबरी

से छन कर आने वाली रोशनी में बैठे हैं हम, हम

यानि मैं, बहन और उसका डेढ साल का बच्चा।



चौदह कोस से तांगे से चलकर आये हम

हमारी शाम वाली गाड़ी छूट गयी थी

और हम इंतजार कर रहे थे रात की आखिरी गाड़ी की

और मुसलाधार बारिश हो रही थी

स्टेशन पर घुप्प अंधेरा था

और दूर-दूर तक रोशनी की कोई चिंगारी तक नहीं थी

हम ढिबरी की रोशनी में

बार-बार स्टेशन मास्टर से पूछ रहे थे

कि गाड़ी आयेगी तो सही

मुसलाधार बारिश को चीरकर गाड़ी आयी

और हम गाड़ी में चढ गए

और इस तरह पैंसठ वर्ष के इस जवान लोकतंत्र में हमने

एक कठिन सफर तय किया।



त त त



फेरबदल







(1)

हुक्मरान बदल गए

हुक्मरान की ताजपोशी हो गई
हम खुश नहीं हुए
हम सच को जानते थे।

(2)
हम सच को जानते थे
इसलिए दुख कम हुआ
लेकिन उनका दुख बहुत है
जो सच से अभी कोसों दूर हैं

(3)
हुक्मरान बदल गए
गार दिए गए उनकी कुर्सी में कीलें
बदल दी गई उनकी कुर्सी
क्योंकि बदल गई थी उनकी नीयत
वे सच का साथ देने लगे थे
वे हवा को हवा कहने लगे थे
वे भूख को कहने लगे थे भूख

(4)
जिन्दगी में फेरबदल जरूरी है
ऐसा हम-आप सब जानते हैं
सब चाहते हैं कि गतिशील हों जीवन
लेकिन इस फेरबदल का क्या मतलब
जहां सिक्के के दोनों ही ओर
अपनी ही उभरी हुई हड्डियों वाला अक्स दिखे।


सुन्दरता


जहां काम चलता है
वहां थोड़े दिनों के लिए ही सही
मजदूर बस जाते हैं
वहां बन जाती है एक छोटी सी दुनिया

 मजदूरों को बसाने के लिए
और इस दुनिया को सुंदर बनाने के लिए
मजदूरों को काम चाहिए


परछाई बिल्कुल हमारे जैसी


          (1)

सामने रोशनी है
हम बैठे हैं
और हमारे पीछे
हमारी परछाई है
बिल्कुल हमारे जैसी        

          (2)

हम खड़े थे
हमारे पीछे रोशनी थी
और हमने अपने कैमरे से
अपनी परछाई की तस्वीर खींची
परछाई की उस तस्वीर में भी
लोग हमको पहचान लेते हैं
ठीक उसी तरह



त त त









परिचय



उमा शंकर चौधरी



एक मार्च उन्नीस सौ अठहत्तर को खगड़िया बिहार में जन्म। कविता और कहानी लेखन में समान रूप से सक्रिय। पहला कविता संग्रह ‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’(2009) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। इसी कविता संग्रह पर साहित्य अकादमी का पहला युवा सम्मान (2012)। इसके अतिरिक्त कविता के लिए ‘अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार’ (2007) और ‘भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार’(2008)। कहानी के लिए ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’(2008)। पहला कहानी संग्रह अयोध्या बाबू सनक गए हैं(2011) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। अपनी कुछ ही कहानियों से युवा पीढ़ी में अपनी एक उत्कृष्ट पहचान। पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित ‘श्रेष्ठ हिन्दी कहानियां(2000-2010) में कहानी संकलित। हापर्स कॉलिन्स की ‘हिन्दी की कालजयी कहानियां’ सीरिज में कहानी संकलित। कहानी ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’ पर प्रसिद्ध रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर द्वारा एनएसडी सहित देश की विभिन्न जगहों पर पच्चीस से अधिक नाट्य प्रस्तुति। कुछ कहानियों और कविताओं का मराठी, बंग्ला, पंजाबी और उर्दू में अनुवाद। पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा पुस्तक ‘श्रेष्ठ हिन्दी कहानियां(1990-2000) का संपादन। इनके अलावा आलोचना की दो-तीन किताबें प्रकाशित।

संपर्कः- - उमा शंकर चौधरी

बध्व ज्योति चावला, स्कूल ऑफ ट्रांसलेशन स्टडीज एण्ड ट्रेनिंग

15 सी, न्यू एकेडमिक बिल्डिंग,

इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-110068 मो.- 9810229111

नउेींदांतबीक/हउंपसण्बवउ                     






















गुरुवार, 5 जुलाई 2012








जन्म- 28.04.1977 को हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के कोलर नामक गाँव में हुआ


हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से विधि स्नातक
वर्तमान में जिला सिरमौर के मुख्यालय नाहन और पांवटा साहिब में वकालत
कवितायेँ विपाशा , आकंठ , सेतु ,सर्जक आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित और आकाशवाणी शिमला से प्रसारित


कुछ कवितायेँ ब्लॉग " आपका साथ , साथ फूलों का " एवम " अजेय " में प्रकाशित

कवि प्रकृति का सजग चितेरा होता है. कब कौन सा दृश्य उसकी कविता का सबब बन जाय यह ठीक-ठीक कोई नहीं बता सकता. कविता ही ऐसी विधा है जिसमें किसी भी अनुभूति को कवि अपने हूनर के दम पर आसानी से पिरो देता है. प्रदीप सैनी एक ऐसे ही युवा कवि हैं जिनकी दृष्टि पैनी है. ‘संवारना’ प्रदीप की एक छोटी और बेहद खूबसूरत कविता है जिसमें वे यह देखते हैं कि किस तरह बाल गूंथते हुए मां अपनी बेटी से एकाकार हो जाती है. दरअसल यह केवल बाल गूंथना ही नहीं, बल्कि पुरानी पीढ़ी का नयी पीढ़ी से ऐक्य है, सृजन और सर्जना से जुड़ा हुआ ऐक्य, जिसकी मार्फ़त बुनी जाती है जीवन की सबसे खूबसूरत कविता. और इसे सहेजने संवारने का दायित्व संभालती हैं महिलायें. जो कहीं माँ, कहीं बेटी, कहीं बहन, कहीं प्रेमिका या पत्नी होती है. बाल संवारने की इस क्रिया के दौरान माँ-बेटी आपस में तमाम तरह की बातें करती हैं. और इस तरह वह अपने अब तक के अनुभवों, अपने अब तक के तमाम हूनर आदि को अपनी बेटी के जीवन के साथ गूंथती चली जा रही है.



आंकड़े केवल संख्याओं की बाजीगरी होते हैं. वे अक्सर हमारे सामने एक ऐसा पर्दा टांग देते हैं जिसके पीछे बहुत कुछ अदृश्य अदेखा रह जाता है. कवि की नजर इन छूट गए लोगों यानी आम जन पर है और वह इनके पक्ष में मजबूती से खडा है. यहीं पर यह कवि औरों से बिलकुल अलग नजर आता है. वह आंकड़ों के सच और बाजार के तिलिस्म से अच्छी तरह परिचित है. और बाजार पर मुग्ध होने वालों को बाजार की असलियत बताता है कि किस तरह बाजार मुग्ध होने वालों का ही चुपके से दाम लगा देता है और उनकी बिक्री के बारे में सोचने लगता है. जबकि मुग्ध होने वाला कुछ जान ही नहीं पाता है.  हकीकत तो तब सामने आती है जब सब कुछ समाप्त हो जाता है.


'पहली बार' कुछ इसी तरह के अंदाज वाले पर प्रस्तुत है इस बार युवा कवि प्रदीप सैनी की कवितायें



संवारना


बेटियों के बाल
जब भी संवारती हैं माँयें
संवरता है बहुत कुछ
उस एकांत में
होती है सिर्फ वे दोनों
एक दूसरे से बतियाती हुई

बालों में समा जाता है
सदियों का संचित रहस्य
सूत्र जो इतिहास में कहीं दर्ज नहीं
न किसी पांडुलिपि में या शिलालेख पर
गुँथते चले जाते हैं बालों के साथ
इन्हीं से साधती हैं बेटियाँ जीवन
और फिर गूँथ देती है
बेटियों के बालों में माँ बन कर ।



उधेड़बुन


अमूमन जाड़ों की दस्तक से पहले ही लगा ली जाती है
गर्म कपड़ों को धूप
किसी तेज़ धूप वाले दिन
होना होता है उन्हें जाड़े के खिलाफ मुस्तैद

जाड़ा अबकी बार ज़रा जल्दी आया है
उसके स्वागत में तैयार नहीं थे
गर्म कपड़े
आज उन्हें जल्दबाजी में किया जा रहा तैयार
धूप इतनी भी तेज़ नहीं है
कि उनकी नम उदासी
भाप बन उड़ सके

करीब साल बाद
अल्मारियों के तहखानों से
सुस्ताए हुए से बाहर निकले हैं गर्म कपड़े
नेपथलिन की गंध से सराबोर

चारपाई पर फैले
स्वेटरों के ढेर में
हाथ का बुना हुआ एक स्वेटर
दिखाई दे रहा है
जैसे अपनी मित्र-मंडली में
दिखाई देता हूँगा मैं
अटपटा और असहज

उस स्वेटर को देख
स्मृतियों का धागा
कई जोड़ पार कर
किसी दूसरे युग में
बाँध आता है अपना सिरा
मैं उस पुल पर
हिचकोले लेने लगता हूं
तभी मां उठा लेती वो स्वेटर
कहते हुए कि पुराना हो गया है
इसे उधेड़ कर फिर बुन लेगें

मैं बता न सका कि माँ
यूँ तो उधेड़े हुए स्वेटर की ऊन से भी
बुना जा सकता है
बुने हुए में से झाँकता है लेकिन
पहले वाला अपनी बुनावट के साथ

हर बुनावट के भी होते हैं अपने किस्से
और कभी-कभी तो
किसी खास बुनती की खोज खबर में
निकल आते हैं ऐसे स्वेटर भी
जिन्हें देख कर हम उनमें लौटना चाहते हैं
यह कोई बड़ा रहस्य नहीं
क्यों कुछ स्वेटर
बिना पहने ही भर देते हैं हमें
गर्माहट से

रुह को कंपा देने वाले वक्त में
जब किसी छुटे हुए कुड़े की वजह से
उधड़ता जा रहा है
स्मृतियों का स्वेटर
मैं करता हूँ ईश्वर का धन्यवाद
कि अभी बुने जा रहे हैं
मेरे लिए गरमाहट भरे स्वेटर
मैं किसी भी जाड़े से
रह सकता हूँ बेपरवाह



सिलवटें


माँ
जब भी तह लगाती हो तुम कपड़े
पापा की कमीज़ आते ही
हाथ कस जाते हैं तुम्हारे
ज़ोर से चलाती हो हाथ
पूरे कमीज़ पर बार-बार
तब भी जब वहाँ कुछ नहीं होता
फिर आदत से मजबूर
रख देती हो कमीज़
बाकी कपड़ों से थोड़ा दूर ।



न्यूटन के सिद्धांत


कहे हुए को साबित करने के अंदाज में
वे जोर से एडि़याँ पटकते हुए
कदमताल कर रहे हैं लगातार
भय है इतना व्याप्त
कि धूल तक नहीं उठती

यह दृश्य
बेचैनी से भर रहा है हमें
जिन्हें यकीन है
प्रत्येक क्रिया
प्रतिक्रिया को जन्म देती है
भले ही कई बार ऐसा होने में
युग बीत जाता है

बड़े दारोगा के हुक्म पर
दुनिया का सबसे बड़ा ख़़ुफि़या तंत्र
एलान कर रहा है
न्यूटन के साथ उसके सिद्धांत भी
अब इतिहास हो चुके हैं
उन्हें भूल कर
कदमताल से उत्पन्न संगीत के साथ
सुरक्षित भविष्य के सपने देखो

ऐसा नहीं है लेकिन
यह कदमताल सुनती तीसरी दुनिया के
तमाम देश जानते हैं
दूर देशों से आसमान में फेंकी हुई चीजें
अपने पूरे वजन और भयावहता के साथ
धरती पर ही गिरती हैं
अभी बचा है
गुरुत्वाकर्षण

न्यूटन यूं अप्रासंगिक नहीं हो सकता ।



जो आँकड़ों में दर्ज नहीं


यूँ तो सभी सर्वेक्षण कितने विश्वसनीय होते हैं
इस पर देश में आम राय है
फिर भी वक्त के चेहरे की खोजबीन
कभी-कभी हमें इन अंधेरी गलियों में ले आती है
हम यहाँ बिखरे पड़े आँकड़ों में
टटोलने लगते हैं उसके नैन नक्ष
हांलाँकि यह पड़ताल का एक सुविधाजनक और कामचलाऊ तरीका है

यहाँ हाथ में चुभती है एक तीखी रेखा
जिसके नीचे एक संख्या बंधी है
गरीबी रेखा के नीचे चालीस करोड़
जहाँ से भी गुजरती है ये रेखा
दो भागों में बँट जाता है दृश्य
और यह रेखा तो फिर देश के माथे तक जाती है

रेखा के ठीक ऊपर गिरते सँभलते कितने टिके हैं
उनके बारे में कोई सुराग़ हाथ नहीं लगता
जबकि रेखा पर खड़ा आदमी ही
कायदे से ग़रीब माना जा सकता है
वो जो रेखा के नीचे हैं
उनके लिए कोई उपयुक्त विशेषण फिलहाल आँकड़ों में मौजूद नहीं
सहूलियत ने उन्हें एक संख्या में तब्दील कर दिया है

आँकड़ों के बाहर कविता में
उन्हें किस नाम से पुकारुँ
जो वे सुन सके मेरी आवाज
और मैं उनकी
वे चालीस करोड़ हमारे समाजशास्त्र में ठीक-ठीक क्या हैं
मैं उन्हें कहूँ चालीस करोड़ जन
और वे सुन कर दें जवाब़
क्या इस तरह बिगड़ तो नहीं जाएगी
विकास की कोई अवधारणा



बाज़ार


खुशखबरी ! खुशखबरी ! खुशखबरी !
आइए
आपका स्वागत हैं यहाँ
आप खरीद सकते हैं कुछ भी
चाहें तो आसान किस्तों पर

चलो भाई
बिकने के लिये तैयार हो जाओ

हैरान मत हो
हाँ मैं तुम ही से कह रहा हूँ दोस्त
जिसे सुनकर उछल रहे हो तुम
वह खुशखबरी
हमारे लिए नहीं
हमारे खरीददारों के लिए है ।



भाई जागो


किवाड़ खोलो
देखो कि अनजान कुत्ते ने
तुम्हारी दहलीज़ से
दोस्ती कर ली है
चौक पर कोई नया बुत खड़ा है
जो आने-जाने वालों पर
निगाह रखे है

सामने मील के पत्थर पर
एक अनजान-से नाम के नीचे
शून्य लटक रहा है

भाई जागो
तुम्हारे शहर का नाम बदल गया है।



पता :
चैम्बर - 145 , कोर्ट परिसर ,
पांवटा साहिब ,
जिला - सिरमौर , हिमचल प्रदेश



ई- मेल - pradeepk.saini@yahoo.co.in
मोबाइल - 09418467632